हमारा बिगड़ा हुआ इतिहास, दंगे-फसाद और समाधान

दोस्तों,

 मलेशिया एक मुस्लिम बहुल राष्ट्र है जिसका इस्लाम राष्ट्रीय धर्म है। इसके बाद भी संजय भंसाली की ‘पद्मावत’ मूवी को बैन कर दिया गया है। मलेशिया के सेंसर बोर्ड ने इस विवादित फ़िल्म को, ‘नॉट रेलेवेंट'( अप्रसांगिक) टिप्पणी के साथ, ‘नॉट एप्रूव्ड लिस्ट'(अस्वीकृत श्रेणी) में डाल दिया है। मलेशिया की सेंसर बोर्ड की नॉट रेलेवेन्ट टिप्पणी का आशय यह होता है ‘यह फ़िल्म समाज मे, समुदायों के बीच घृणा व असहजता फैलायगी’। http://www.firstpost.com/entertainment/padmaavat-banned-in-malaysia-by-countrys-censor-board-as-it-hurts-sensitivities-of-islam-4325809.html

62% मुस्लिमो का इस्लामिक राष्ट्र मलेशिया यह समझता है लेकिन भारत की धर्मनिर्पेक्षिता नही समझती है। यहां तो सेंसर बोर्ड से लेकर सर्वोच्च न्यायलय तक, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर सब बेचने और बिकने को तैयार है, आखिर यह भी तो अभिव्यक्ति की उनकी स्वतंत्रता है, भले ही भारत और उसके हिन्दू का मान लोगो के उपहास और कटाक्ष की ज्वाला में जले तो जले।

 पाकिस्तान में भारतीय सेंसर बोर्ड को ठेंगा दिखाकर भंसाली ने बिना कोई परिवर्तन किये मूल फिल्म को पाकिस्तान में दिखाना आरम्भ कर दिया| उसमें महारानी पद्मावती और अलाउद्दीन का अश्लील ड्रीम सीक्वेंस भी है और मूल झूमर नृत्य भी है, जबकि भारतीय सेंसर बोर्ड ने ड्रीम सीक्वेंस पूरा हटवा दिया और झूमर नृत्य दुबारा फिल्माया ताकि किसी की भावना को ठेस न पंहुचे | भारतीय सेंसर बोर्ड ने बहुत से दृश्यों को पूरी तरह से हटवाया, जबकि पाकिस्तान में वे सारे अशोभनीय दृश्य दिखाए जा रहे हैं और पाकिस्तान की सेंसर बोर्ड महारानी पद्मावती के अपमान का आनन्द ले रही है| https://timesofindia.indiatimes.com/entertainment/hindi/bollywood/news/padmaavat-gets-smooth-clearance-for-pakistan-release/articleshow/62641921.cms?from=mdr

“पाकिस्तान में रिलीज पदमावत की उक्त जानकारियाँ” कुछ रात पहले जी-न्यूज़ टीवी ने दिखाई है |
अब भारत की बिकाऊ मीडिया प्रचार कर रही है कि फिल्म में महारानी पद्मावती की इज्जत से कोई खिलवाड़ नहीं किया गया था और “अपराधी तत्व” केवल चुनाव को ध्यान में रखकर हंगामा कर रहे हैं | एक भी टीवी चैनल ने यह नहीं कहा कि भंसाली ने गन्दे दृश्यों वाला मूल फिल्म पाकिस्तान में दिखाकर अपनी गन्दी सोच को स्पष्ट कर दिया | जी-न्यूज़ तो महाराणा प्रताप का हवाला देकर राजपूतों को नीचा दिखा रही है, यह नहीं बतला रही है कि महारानी पद्मावती राणा प्रताप की पूर्वजा थीं |
महाराष्ट्र भाजपा के एक प्रमुख नेता राज पुरोहित जी का “स्टिंग ऑपरेशन” रिपब्लिक टीवी ने दिखाया और “सिद्ध” किया कि भाजपा की सरकार ने जानबूझकर आगामी चुनावों को ध्यान में रखकर सारा हंगामा कराया |https://www.youtube.com/watch?v=Y9DNlwd9dT8

एक दुसरे व्यक्ति ने रिपब्लिक-टीवी की बहस में सबूत दिखा दिया कि कांग्रेस का नेता राजस्थान में करणी सेना के आन्दोलन का समर्थन कर रहा है, किन्तु मीडिया केवल भाजपा के विरुद्ध हंगामा कर रही है |

वहीँ, मध्यप्रदेश में उपद्रवियों का साथ देती दिखी पुलिस: https://www.jansatta.com/rajya/in-madhya-pradesh-police-seen-with-goons-and-refused-to-take-action-against-violent-protester/558798/

 जिस पैनल को पद्मावती फिल्म दिखायी गयी थी उनमें से एक इतिहासकार का कहना है कि — इससे पहले कि हम अपने ऐतराज एवं टिप्पणियाँ सेंसर बोर्ड को भेजें उससे पहले ही फिल्म को सर्टिफिकेट दे दिया गया !!

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( see video 12:30 to 14:20 ) https://www.youtube.com/watch?v=mWAc0cEhHZ8&feature=youtu.be&t=464 

फिल्म देखेने वाले प्रो कपिल कुमार जी का कहना है कि, सायं 7 बजे फिल्म खत्म हुयी और कुछ मौखिक चर्चा के बाद हमने कहा कि हम अपना दृष्टिकोण कल आपको लिखित में देंगे। लेकिन सेंसर बोर्ड अध्यक्ष प्रसून जी जोशी ने रात को ही फिल्म को हरी झंडी दे दी थी। अगले दिन हम जवाब भेजे उससे पहले मीडिया में खबर आ गयी थी कि फिल्म को सर्टिफिकेट दे दिया गया है !!! 

 दोस्तों, “सरकार” अपने-आप में बहुत बड़ी शक्ति होती है, एक बार वह ठान ले, कि कोई काम नहीं करने देना है, तो वह काम बाकायदा संविधान और क़ानून का पालन करके भी नहीं होने दिया जाएगा… सब कुछ “इच्छाशक्ति” पर निर्भर है.

भारतीय “सिनेमेटोग्राफी एक्ट की धारा धारा 5F एवं 6 के अंतर्गत केंद्र सरकार चाहे तो आज भी पद्मावत फिल्म के प्रसारण को रोक सकती है. “क़ानून-व्यवस्था” बनाए रखने के नाम पर सरकार के पास पूरे अधिकार हैं. राज्यसभा में बहुमत की आवश्यकता नहीं है. सभी सरकारों की सबसे पहली प्राथमिकता क़ानून-व्यवस्था और शान्ति बनाए रखने की है, और इसके लिए चाहे जैसे प्रतिबंधात्मक आदेश लागू किए जा सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट में बाकायदा संतोषजनक लिखित जवाब देकर. 

पहली बात तो यह है कि सरकार “चाहती”, तो CBFC (सेंसर बोर्ड) से यह फिल्म पास ही नहीं होती. चलो अब पहली गलती हो गयी तो कोई बात नहीं, अभी भी सरकार के पास ऐसे कई “बहाने और पतली गलियाँ” मौजूद हैं, जिनके द्वारा पद्मावत फिल्म को अनंतकाल तक डिब्बे में बंद रखा जा सकता है.

इसके लिए केंद्र सरकार को एक अधिसूचना निकालनी होगी जिसमें इन दो धाराओं को इंगित किया गया हो।
कुछ उदाहरण देखिये : 
१) गुजराती फिल्म “पॉवर ऑफ़ पाटीदार” 2016 में बनायी गयी , और इसे गुजरात सेंसर बोर्ड ने विधिक रूप से रोक लिया ( फिल्म गुजराती भाषा में होने के कारण इसे गुजरात सेंसर बोर्ड से प्रमाणित होना था )। निर्माता अदालत में चले गए और यह मामला पिछले 2 साल से अदालत में लटका हुआ है !!
भारत में कानूनी रूप से प्रतिबंधित फिल्मो की सूची देखें।  https://en.wikipedia.org/wiki/List_of_films_banned_in_India
२) इसी तरह से , भारत में कई किताबें प्रतिबंधित की गयी है। और संविधान किताबों एवं फिल्मो में “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” के नाम पर कोई फर्क नहीं करता। इन्हें एक ही श्रेणी में रखता है। तो जिस तरह से पुस्तके प्रतिबंधित की जा सकती है , उसी तरह से फिल्मो को भी प्रतिबंधित किया जा सकता है।  https://en.wikipedia.org/wiki/List_of_books_banned_in_India
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फिल्म पद्मावत को अदालत द्वारा हरी झंडी दी गयी क्योंकि — १) केंद्र सरकार के मुख्य नीति नियन्ता साहेब बिक गए और उन्होंने धारा 5F एवं 6 को निर्दिष्ट करते हुए अधिसूचना जारी नहीं की, २) जजों ने फिल्म के प्रायोजकों से घूस खा ली।
इसके अलावा, यदि केंद्र एवं राज्य सरकारें चाहती तो इस फिल्म को भारतीय दंड संहिता की धारा 295 एवं 295A के तहत बेन कर सकती थी। यदि फिल्म को इन धाराओं के तहत बेन किया जाता तो केस मजबूत बनता और निचली अदालत में ही यह केस अगले 10 साल तक घिसटता रहता।
कहने की जरुरत नहीं कि, मोदी साहेब, योगी जी , संघ के नेता एवं इनके कार्यकर्ता इस फिल्म का जबरदस्त समर्थन कर रहे है और इसीलिए उन्होंने इस फिल्म को रोकने के लिए कोई भी आवश्यक कदम नहीं उठाये और उनकी जानबूझकर अनदेखी की। 

 प्रस्तावित समाधान

नागरिको को नेताओं का पूजन करने की जगह राईट टू रिकॉल, ज्यूरी सिस्टम, वेल्थ टेक्स आदि क़ानून लागू करवाने के लिए प्रयास करने चाहिए। इन कानूनों के आने से भारत की स्थानीय इकाइयों की निर्माण क्षमता बढ़ेगी और अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों का प्रभाव कम होने लगेगा। अन्यथा, सोनिया-मोदी-केजरीवाल के भरोसे रहने से भारत पर अमेरिकी-ब्रिटिश धनिकों का पूर्ण नियंत्रण लगभग नहीं बल्कि पूरी तरह से तय है।  दोस्तों, हमारे देश में हर क्षेत्र में अर्थात इतिहास-निर्माण से लेकर कल-कारखानों में निर्माण तक किस तरह से विदेशी धन-पिशाचों द्वारा नियंत्रित होते हैं, इस लेख के अंतिम हिस्से में पढ़ें.

  • राईट टू रिकॉल मुख्यमंत्री के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट : fb.com/notes/1476067969152854
  • राईट टू रिकॉल प्रधानमंत्री के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट : fb.com/notes/1476078685818449
  • राईट टू रिकॉल मंत्री के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट : fb.com/notes/1476084522484532
  • राईट टू रिकॉल सांसद के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट : fb.com/notes/1475749302518054
  • ज्यूरी सिस्टम के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट : fb.com/notes/1475753109184340
  • राईट टू रिकॉल, ज्यूरी सिस्टम एवं वेल्थ टेक्स के प्रस्तावित कानूनों के ड्राफ्ट इस लिंक पर देखें https://www.facebook.com/notes/1479571808802470
  • सांसद व विधायक के नंबर यहाँ से देखें nocorruption.in/
🚩 अपने सांसदों/विधायकों को उपरोक्त क़ानून को गजेट में प्रकाशित कर तत्काल प्रभाव से क़ानून लागू करवाने के लिए उन पर जनतांत्रिक दबाव डालिए, इस तरह से उन्हें मोबाइल सन्देश या ट्विटर आदेश भेजकर कि:-
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” माननीय सांसद/विधायक महोदय, मैं आपको अपना एक जनतांत्रिक आदेश देता हूँ कि‘ “राईट टू रिकॉल मुख्यमंत्री के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट : fb.com/notes/1476067969152854 

को राष्ट्रीय गजेट में प्रकाशित कर तत्काल प्रभाव से इस क़ानून को लागू किया जाए, नहीं तो हम आपको वोट नहीं देंगे.
धन्यवाद,
मतदाता संख्या- xyz ”
इसी तरह अन्य ड्राफ्ट के लिए भी आदेश भेज सकते हैं .
आप ये आदेश ट्विटर से भी भेज सकते हैं. twitter.com पर अपना अकाउंट बनाएं और प्रधामंत्री को ट्वीट करें अर्थात ओपन सन्देश भेजें.

ट्वीट करने का तरीका: होम में जाकर तीन टैब दिखेगा, उसमे एक खाली बॉक्स दिखेगा जिसमे लिखा होगा कि “whats happening” जैसा की फेसबुक में लॉग इन करने पर पुछा जाता है कि आपके मन में क्या चल रहा है- तो अपने ट्विटर अकाउंट के उस खाली बॉक्स में लिखें  ” @PMO India I order you to print draft “RTR-CM  : fb.com/notes/1476067969152854

in gazette notification asap” . इसी तरह अन्य ड्राफ्ट के लिए भी आदेश भेज सकते हैं . बस इतना लिखने से पी एम् को पता चल जाएगा, सब लोग इस प्रकार ट्विटर पर पी एम् को आदेश करें.

याद रखें कि इस तरह की सभी मांगों के लिए सौ-पांच सौ की संख्या में एकत्रित होकर ही आदेश भेजिए, इसी तरह से अन्य कानूनी-प्रक्रिया के ड्राफ्ट की डिमांड रखें. यकीन रखे, सरकारों को झुकना ही होगा.

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  पद्मावत मूवी में छिपा षड्यंत्र:

दोस्तों, पद्मावती विवाद के गर्भ में छिपा षडयंत्र न केवल भारतीय समाज के लिए, बल्कि पूरी दुनिया की  सभ्यताओं के लिए दो बहुत गंभीर समस्याएं खड़ा करता है। सबसे पहले ब्रिटिश द्वारा फर्जी भारतीय इतिहास का निर्माण है जो कि दूसरी समस्या का मार्ग प्रशस्त करता है – काल-निर्धारण में हमारे स्थान की जागरूकता की कमी। क्योंकि हमने अभी तक इन मुद्दों का समाधान नहीं किया है, हम आज भी इसी गड़बड़ी में फंसे हुए हैं।

पद्मावती विवाद ने कई सिद्धांतों को जन्म दिया और अनेक भारतीय बुद्धिजीवियों को उत्साहित किया। न केवल राजनेताओं, मशहूर हस्तियों या कार्यकर्ताओं ने बल्कि इतिहासकारों ने भी इस मुद्दे को खूब प्रचारित किया। हालांकि कुछ इतिहासकारों ने पद्मावती के अस्तित्व पर सवाल उठाए हैं, जबकि अन्य ऐसे हैं जो कहानी पर विश्वास करते हैं लेकिन खुद को अलाउद्दीन खिलजी की समय-सीमा के साथ सामंजस्य स्थापित करने में असमर्थ पाते हैं। अंत में हम ऐसी स्थिति में हैं जहां इतिहासकार सभी उपलब्ध विवादित जानकारी को जाँचने में सक्षम नहीं हैं और एक सुसंगत कथा पर सहमत होने में असमर्थ हैं। जब इतिहासकार स्वयं एक उचित ऐतिहासिक साक्ष्य प्रदान करने में सक्षम नहीं हैं, तो हम बाकी लोगों से क्या उम्मीद कर सकते हैं?

पद्मावती विवाद के मूल में जेम्स टॉड नाम के एक ब्रिटिश खुफिया अधिकारी है, और ये संपूर्ण बहस उसी पर निर्भर है। भारत पर आक्रमण करने के लिए सबसे नवीनतम विदेशियों होने के नाते, ब्रिटिश अपने स्वयं के आगमन के लिए न्यायोचित समर्थन चाहते थे। एडवर्ड गिब्बॉन ने 1776 में जब ब्रिटेन ने अमेरिका में अपनी 13 कॉलोनियों को खो दिया था, तब रोमन साम्राज्य का इतिहास, द हिस्ट्री ऑफ द डिक्लाइन एंड फॉल ऑफ द रोमन इम्पाइर  का पहला खंड प्रकाशित किया| गिब्बन के काम का एक केंद्रीय विषय उनकी पैक्स ब्रिटैनिका – ब्रिटिश-प्रभुत्व वाले विश्व व्यवस्था की अवधि – और पैक्स रोमाना  के बीच ऐतिहासिक संबंधों की खोज थी|

उन्होंने एक ऐसे सिद्धांत के लिए आधारशिला प्रदान की जो ब्रिटिश औपनिवेशिक उद्यम और ब्रिटिश के भारत पर कब्जा करने को वैध बनाता है। 19वीं शताब्दी तक, ब्रिटिश खुफिया अधिकारियों की एक नई पीढ़ी भारत के इतिहास की विद्वान बन गई। वे खुद को उत्तरार्द्ध सिकंदर द ग्रेट्स के रूप में कल्पना करने लगे। उन्होंने भौगोलिक, लोक और वस्तुओं के खातों को इकट्ठा करना शुरू कर दिया, जो कि भारत को यूनानियों से जोड़ते हैं, और अतीत के रोमनों को। अलेक्जेंडर बर्नेस, जेम्स टॉड, रिचर्ड एफ बर्टन और एडवर्ड बी ईस्टविक उनमें सबसे प्रमुख थे।

इसलिए ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा नियोजित, जेम्स टॉड ने भारत के अतीत को ब्रिटिश शाही प्रोजेक्ट के हिस्से के रूप में राजस्थान के इतिहास और प्राचीन वस्तुएं लिखीं। यह प्रकाशित कार्य इस पूरे पद्मावती विवाद के लिए और साथ ही साथ भारतीय इतिहास में फेरबदल के लिए एक बहुत विशिष्ट मार्कर के रूप में कार्य करता है। एक बार यह किताब ब्रिटिश भारत की राजधानी कोलकाता में निर्यात की गई, तब इसे बंगाली कथाओं में भी शामिल किया गया और आज भी इतिहासकारों के एक वर्ग द्वारा इसका उल्लेख किया जाता है, इस तथ्य के बावजूद कि यह काम पूरी तरह से धोखाधड़ी साबित हुआ है।

जेम्स टॉड के प्रमुख जीवनी लेखक जेसन फ्रीटाग ने अपनी पुस्तक सर्विंग एम्पायरसर्विंग नेशन: जेम्स टॉड और राजपूत राजस्थान में जेम्स टॉड की संदिग्ध व्याख्याओं पर प्रकाश डाला है, जिसे साबित करने के लिए अपर्याप्त साक्ष्य का सहारा लेते है, जिन्हे अब अविश्वसनीय माना जाता है। एक और किताब जो जेम्स टॉड की जानबूझकर भारतीय इतिहास से छेड़छाड़ को बेनकाब करता है, वह राम्या श्रीनिवासन द्वारा लिखी गई एक पुस्तक एक राजपूत रानी के बहुत से जीवन: भारत का वीर अतीत है। अपने काम में राम्या दर्शाती है कि जेम्स टॉड का राजपूत पहचान का निर्माण केवल औपनिवेशिक परियोजना का एक हिस्सा नहीं था, बल्कि भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन का एक हिस्सा भी इससे काफ़ी प्रभावित था।

आज भी टोड उन लोगों द्वारा सम्मानित किया जाता है जिनके पूर्वजों ने उन्हें अच्छी रोशनी में प्रलेखित किया था। 1997 में, महाराणा मेवर चैरिटेबल फाउंडेशन ने ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा नियोजित इस ब्रिटिश खुफिया अधिकारी के नाम पर एक पुरस्कार की स्थापना की। यह पुरस्कार उन आधुनिक गैर-भारतीय लेखकों को दिया जाता है जो “टॉड के काम का उदाहरण देते हैं”। मेवार प्रांत में, जेम्स टॉड के सम्मान में एक गांव को “टॉडगढ़” नाम दिया गया है। यह भी दावा किया जा रहा है कि टॉड वास्तव में कर्म और पुनर्जन्म की प्रक्रिया के परिणाम के रूप में एक राजपूत था।

वर्तमान भारतीय नेताओं के लिए ब्रिटिश विद्वानों या सैन्य रणनीतिकारों की प्रशंसा करना स्वाभाविक है और यह एक आश्चर्य नहीं होना चाहिए। यहां तक कि आज भी अंग्रेजों के साथ सम्मोह हमारे राष्ट्रवादी नेतृत्व पर छाई हुई है, जो भारत की विदेशनीति पर प्रेरणा के लिए भी लार्ड पामरस्टोन और हेनरी किसिंजर जैसे औपनिवेशिक रणनीतिकारों के आगे सर झुकाते है और उनकी मिसाल कॉलेज के बच्चों को भी देते है। पामरस्टन – जिसका सिद्धांत मध्य एशिया के सभी भयानक युद्धों और भारत के विखंडन के लिए जिम्मेदार है। किसिंजर – जो 1971 के युद्ध के दौरान उत्तर से चीनी को उकसा कर और पूर्व से अमेरिकी सातवें बेड़े और पश्चिम से रॉयल नेवी के साथ भारत का विभाजन करने के लिए तैयार था।

भौगोलिक दृष्टि से भारत को दुनिया के बाकी हिस्सों से काटने की यह बहुत ही जबरदस्त रणनीति थी और ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारतीय इतिहास की हॉलीवुड शैली में उत्पादन के लिए जेम्स टॉड जैसे ब्रिटिश खुफिया अधिकारी को रोजगार दिया था। टॉड का प्रारंभिक मिशन मेवाड़, कोटा, सिरोही, बूंदी और बाद में मारवार और जैसलमेर के पहाड़ी क्षेत्रों का सर्वेक्षण करना था। ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा इन क्षेत्रों को खैबर दर्रा के माध्यम से उत्तर से रशिया-भारतीय अग्रिमों के विरुद्ध एक बफर ज़ोन माना जाता था।

सालों तक कई भारतीय राज्यों ने रसियन, फ्रांसीसी और जर्मन लोगों के साथ गठबंधन किया, ताकि अंग्रेजों को भारत से बाहर खदेड़ा जा सके और ब्रिटिश साम्राज्य को समाप्त किया जा सके। एक संयुक्त इंडो-रशियन, इंडो-फ्रांसीसी या इंडो-जर्मन सेना जो उत्तर भारतीय सीमा से हमले शुरू करें और साथ ही साथ देश के भीतर एक विद्रोह के डर से ब्रिटिश सैन्य रणनीतिकार आतंकित थे, जब तक की वे पश्चिम, उत्तरी और पूर्वी मोर्चों पर बफर जोन बना कर भारत छोड़ गए।

जेम्स टॉड के काम का उद्देश्य राजपूताना और मुगल राजाओं के बीच भ्रम फैलाकर और विभिन्न हिंदू संप्रदायों और मुसलमानों को विखंडित करके ब्रिटिश के खिलाफ सामूहिक विद्रोह के इस खतरे को समाप्त करना था। उसी समय यह विभाजन और शासन रणनीति ब्रिटिश साम्राज्य में अन्य जगहों पर भी खेली जा रही थी। जैसे जेम्स टॉड भारत में राजपूताना अभिमान के उद्धारकर्ता के रूप में पेश किया गया था, एक अन्य ब्रिटिश खुफिया अधिकारी अलेक्जेंडर बर्नेस को अफगानिस्तान में अफगानों और रूसियों के बीच एक दरार बनाने के लिए मुसलमान के रूप में प्रच्छन्न काबुल से बोखरा भेजा गया था। जब अफगानों ने रूसी लोगों की मदद से बर्न्स को पहचान लिया, तो उसे स्थानीय बाजार में एक खूटी पे टांग कर फांसी दे दी। जेम्स टॉड इस मामले में तो काफी भाग्यशाली था। आज तक भारतीयों ने कभी जेम्स टॉड की असली पहचान के बारे में जानने की कोशिश नहीं की।

दोस्तों, जेम्स टॉड की लिखी पुस्तकों को आज हमारे देश में वनस्थली विद्यापीठ जैसे कई प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थानों में पढ़ाया जाता है और सेंट्रल अर्कियोलॉजिकल लाइब्रेरी में भी इसकी लिखी पुस्तकों को एक मानक के रूप में माना जाता है, जबकि होना ये चाहिए थे कि भारत को आजादी मिलने के बाद अपना इतिहास स्वयं स्थापित करना चाहिए था, न कि ईस्ट इण्डिया कंपनी के आदमियों द्वारा तोड़ी-मरोड़ी हुई इतिहास को हम अपना इतिहास मानकर उसे ही अपना पैमाना मान लें.

आज यदि हमारे देश में अर्कियोलॉजिकल डिपार्टमेंट कोई ऐसी खोज करता है जिससे ब्रिटिश व्यवस्था को चुनौती मिले, तो ऐसी खोजो को हमारे देश में सर्वोच्च पदों पर आसीन अधिकारियों द्वारा दबा दिया जाता है. यहाँ की भ्रष्ट प्रशासनिक व्यवस्था में यदि आप सोचते हैं कि कोई खोज जो मौलिक भी हो और ब्रिटिश व्यवस्था को चुनौती देता हो और ऐसे खोज को सार्वजनिक किया जाए तो आपकी सोच गलत है.

अतः, सभी पदों पर राईट-टू-रिकॉल ही वास्तविक समाधान है जिससे इमानदार एवं निष्ठावान अधिकारी ही कार्य कर सकें और ब्रिटिश क़ानून के अधीन रहने वाले अधिकारी नाप सकें.

 मित्रों, इसी तरह १५ अगस्त १९४७ के समय, देश का विभाजन हिन्दू-मुस्लिम बंटवारे के नाम पे अंग्रेजों ने रूस को नियंत्रित करने के लिए किया था, साथ ही गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट-१९१९ के अनुसार ब्रिटिश भारत की पुलिस,  सींचाई, लैंड-रेवेन्यु, जेल व्यवस्था एवं तत्कालीन मीडिया का नियंत्रण ब्रिटिश राज्यपाल और उसके कार्यकारिणी समूह द्वारा किया जाता था. भारत-विभाजन के समय जितनी बड़ी संख्या में हिन्दू-मुस्लिम लोगों ने दंगे, बलात्कार, ह्त्या इत्यादि झेला, उसे नियंत्रित करने के लिए आवश्यक व्यवस्था को अंग्रेजों के अंतिम वायसराय माउंटबैटन के नियंत्रण में लिया जा चूका था और देश में विश्व की बड़ी नरसंहार में से एक को अंजाम दिया गया.

 दोस्तों, सभ्यताओं के संघर्ष के जिस मुहाने पर दुनिया आज खड़ी है वह कोई नई बात नहीं है, भारत भूमि ने ऐसे हिंसक आक्रमणों को पहले भी अपने सीने पर झेला है. जब भी बर्बरता के कदम भारत पर पड़े हैं तब-तब आम जनता पर अकल्पनीय अत्याचार इतिहास के पन्नों में दर्ज है. भारत समाज की स्त्रियाँ बर्बरता की इन आंधियों का सदैव से सामना करती आई हैं, पराजित सभ्यता के वासियों पर आक्रांताओं का जो कहर टूटता है उसकी सबसे बड़ी मार स्त्रियों पर होती है. वहशी लुटेरों द्वारा सामूहिक बलात्कार, परिवार-कुल के सभी पुरुषों/बच्चों की हत्याएं और कोख को नष्ट करना आदि जैसे अनिवार्यतः किये जाने वाले कुकृत्य थे. जिन स्त्रियों को यह स्थिति भोगनी पड़ जाती थी, उनके लिए भी अपनी कोख से आक्रांताओं के वंशजों को जन्म देने से बड़ी शर्म की बात कुछ न थी. जरा सोचें जिन्होंने आपका सुहाग, कुटुम्ब नष्ट कर दिया, बच्चों की निर्मम हत्याएं कर दीं उनके हाथ में पड़कर उनसे बलत्कृत होकर उन्हीं की संततियों को जन्म देने से बड़ी शर्म भला क्या होगी ? ऐसी ही स्त्रियों ने अपने आत्मसम्मान और मर्यादा का मान रखने के लिए आत्मोत्सर्ग का मार्ग चुना, कहीं इसे ‘जौहर’ के रूप में कहीं ‘जहर की पुड़िया’ के रूप में कहीं कटार के के रूप में ध्येय सिर्फ़ इतना था कि बलिदान होकर भी अपने सतीत्व की रक्षा की जाये ताकि बर्बरता की संततियों को जन्म देने का लांक्षन इतिहास उनपर न लगा सके. हाँ आत्मोत्सर्ग भी अनिवार्य व्यवस्था नहीं थी, यह तो बस युद्धकालीन और संकटकाल की एक रणनीति मात्र थी. यह पूरी प्रजा के लिए न होकर सिर्फ़ उनका चुनाव था जिनके पास बच निकलने या युद्ध करने का कोई विकल्प शेष न था. आज आत्मोत्सर्ग की यह प्रेरणा वामधूर्तों के निशाने पर है, शांतिधूर्त मज़हब के लोग भी सुर में सुर मिला रहे हैं, जिन स्त्रियों ने इतिहास में ‘आत्मोत्सर्ग’ की धारा चुनी उनको कायर कहा जा रहा है. दरअसल आत्मोत्सर्ग का मार्ग वाम मज़हब और शांति मज़हब के विस्तार की राह का रोड़ा है, ज़रा हालिया इतिहास को देखें तो सोवियत रूस ने जर्मनी की हरेक स्त्री को कलंकित करके अपनी विजय का शंखनाद किया था, बांग्लादेश में शान्तिधूर्तों ने ठीक यही कार्य नियाज़ी औऱ याह्या खान के नेतृत्व में किया.

लाखों करोड़ों स्त्रियों को कलंकित किया जिनकी संततियां आज आत्मग्लानि के बोझ में जीने को अभिशप्त हैं. वामधूर्तों और शान्तिधूर्तों के लिए सभ्य समाज की स्त्रियां एक ऐसा प्रलोभन मात्र हैं जो उनके ख़ेमे की संख्या को बढ़ाने में काम आती हैं. इन वामधूर्तों ने आज ‘स्त्रीत्व’ के निशाने पर ‘सतीत्व’ को ला खड़ा किया है. सतीत्व और आत्मोत्सर्ग को स्त्रियों की कायरता बताया जा रहा है. आज फिर से निशाना हमारी स्त्रियाँ ही हैं, इतिहास का इस दौर में जब फैसले लेने की स्वतंत्रता स्वयं स्त्रियों के हाथ में ही है तो उन्हें सोचना ही चाहिए कि ‘सतीत्व’ कभी भी ‘स्त्रीत्व’ के विरुद्ध न होकर उसकी पवित्रता का एक हिस्सा ही रहा है. आज फिर से सतीत्व निशाने पर है हालाकिं आक्रांताओं के हथियार बदल गए हैं.

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सेक्यूलर वामपंथी एवं देश-विरोधी लोग बहुमत में नहीं हैं, पानी के ऊपर वे गन्दी काई की पतली परत हैं जिसे कलियुग में भ्रमवश क्रीमी लेयर समझा जाता है | भोगवादी आसुरी अपसंस्कृति के वे संवाहक हैं, हज़ार वर्षों की दासता की नाजायज पैदाइश – जिन्होंने विदेशी लुटेरों के तलवे चाटकर महत्वपूर्ण पदों और राष्ट्रीय सम्पत्ति पर कब्जा जमा रखा है | देश का बहुमत अभी तक इस अपसंस्कृति से बचा हुआ था, किन्तु सिनेमा और टीवी अब उन्हें भी प्रभावित कर रहे हैं | परन्तु कालचक्र की धारा अब पलट चुकी है, जो अपनी दिशा काल के अनुरूप नहीं पलटेंगे वे सब के सब कालकवलित होने जा रहे हैं, चाहे वे किसी भी सम्प्रदाय या देश के क्यों न हों | हिन्दू-हिन्दू चिल्लाने से जान नहीं बचेगी, सनातन धर्म को जीवन में उतारना पड़ेगा | नयी प्रजाति आ चुकी है | जानेवाली प्रजाति उसे पहचान भी नहीं सकेगी |
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 Note: कार्यकर्ता अपने हर स्तर के अफसरों को कहें कि साईट बनाएँ जिसमें नाम डालकर उनके द्वारा समर्थित या विरोध हुआ बिल का पता चले और बिल का पीडीऍफ़ भी

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जय हिन्द, जय भारत, वन्दे मातरम् ||

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