राईट टू रिकॉल कानूनो की व्यवहारिकता को लेकर व्यक्त किए गए कुछ संदेह और उनका निराकरण

RTR DEO hindi
प्रस्तावित राईट टू रिकॉल-शक्षा अधिकारी जो शिक्षा अधिकारी के व्यवहार और काम को सुधरेगा, उसका सारांश. अधिक जानकारी के लिए देखें – tinyurl.com/RTRShiksha

“राईट टू रिकॉल कानूनो की व्यवहारिकता को लेकर व्यक्त किए गए कुछ संदेह”

 1. राइट टू रिकॉल कानून निश्चित रूप से एक बहुत कारगर हथियार सिद्ध हो सकता है लेकिन सबसे पहले मैं फिर कहता हूं भारतीय जनता को समग्र रूप से शिक्षित होना बहुत आवश्यक है नहीं तो इस कानून का भी भरपूर दुरुपयोग हो सकता है आपने देखा होगा जिस तरह से दहेज कानून सुचना का अधिकार कानून यह सब अच्छे कानून है लेकिन कुछ लोग इसका भी नाजायज फायदा उठाकर सही लोगों के खिलाफ गलत रणनीति का प्रयोग कर उन्हें सताते हैं ।

उत्तर :-
जवाहर लाल और मनमोहन दोनों ही उच्च शिक्षा धारी व्यक्ति है। लेकिन दोनों ने ही अपने कार्यकाल में ऐसे तमाम फैसले किये जिससे देश को सिर्फ नुक्सान हुआ। क्योंकि उनकी सत्ता लोलुपता और नियत उनकी शिक्षा पर भारी पड़ रही थी। जबकि इंदिरा जी ने सामान्य शिक्षित होने के बावजूद बहुत अच्छा शासन दिया। दरअसल शिक्षा का समझ से कोई लेना देना नहीं है। समझ कॉमन सेन्स है। यदि किसी व्यक्ति में अनुभव व सूचना जन्य राजनैतिक विवेक है तो वह ज्यादा बेहतर ढंग से निर्णय ले सकेगा। यही बात मतदाताओ पर भी लागू होती है। भारत का संविधान भी इस बात पर मुहर लगाता है, और इसीलिए पीएम, सीएम, सांसद या विधायक बनने के लिए किसी भी प्रकार की शैक्षणिक योग्यता को अनिवार्य नहीं किया गया है। जबकि ये ही लोग यह तय करते है कि देश चलाने के लिए किन कानूनों को लागू किया जाना चाहिए।
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तो जब प्रधानमंत्री बनने के लिए शैक्षिणक योग्यता शून्य है ( और यह ठीक भी है ) है तो हम उन्हें चुनने वाले लोगो के विवेक का निर्धारण शिक्षा के आधार पर क्यों कर रहे है। असल बात विवेक है, जो कि मायने रखती है।
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तो सही प्रश्न यह है कि भारत के नागरिको की राजनैतिक समझ बढ़ाने के लिए हमें क्या उपाय करना चाहिए ? समाधान — राईट टू रिकॉल एवं ज्यूरी सिस्टम है।
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अमेरिका और ब्रिटेन में ज्यूरी प्रथा आने से नागरिको की भागीदारी क़ानून, अदालत, पुलिस प्रशासन आदि में रचनात्मक रूप से बढ़ने लगी, जिससे उनमें इन विषयों को समझने की बुद्धि विकसित हुयी, राईट टू रिकाल कानूनों ने उनकी भागीदारी को और बढ़ाया । उन्होंने कानूनों का महत्त्व समझा और अच्छे नेता की जगह अच्छे कानूनों पर ध्यान दिया ।भारत में आज़ादी मिलने के बाद भी जनता की लोकतंत्र में भागीदारी सिर्फ 5 साल में एक बार वोट करने तक सिमित रही, अत: हम पिछड़ते चले गए । एक वर्ग जान्बूझकर और एक वर्ग अनजाने में आज भी पूरी शक्ति से यह प्रयास कर रहा है कि भारत की स्थिति यथावत बनी रहे ।
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देहात में जाकर पूछिए कि जिला पुलिस प्रमुख या सीबीआई निदेशक कौन है । किन्तु यदि आप स्थानीय विधायक, सांसद, मुख्यमंत्री या प्रधानमन्त्री का का नाम पूछेंगे तो ज़्यादातर लोग आपको सही जवाब इसलिए देंगे, क्योंकि इनकी चयन प्रक्रिया में उनकी भूमिका थी। बिना सहभागिता के जनता में राजनैतिक समझ आना दूर की कौड़ी है ।
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अमेरिका में नागरिक पुलिस प्रमुख और शिक्षा अधिकारी को चुनते है, सांसद व विधायको को चुनते है और यहाँ तक कि जजो को भी चुनते है !!! नतीजा यह होता है कि वे इन विभागों में एवं इन पदों के उम्मीदवारों के कार्यकलापो में रुचि लेते है। क्योंकि वे जानते है कि उन्हें वोट करना है। इससे उनमे मसलो को समझने के समझ पैदा होती है। यदि भ्रष्ट पुलिस प्रमुख को नौकरी से निकालने का अधिकार भारत के नागरिको के पास होगा तो नागरिक स्वयं ही पुलिस प्रशासन में रूचि लेने लगेंगे ।
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शिक्षा  :
यदि आप शिक्षा स्तर सुधारना चाहते है, तो राईट टू रिकाल जिला शिक्षा अधिकारी की मांग कीजिये ।

भारत के लोग अशिक्षित है, और अमेरिका के शिक्षित, तो इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि वहां राईट टू रिकाल जिला शिक्षा अधिकारी है, जबकि भारत में ऐसा न होने के कारण 8 वीं क्लास तक बिना फ़ैल किये पास कर दिया जाता है, और 3 दिन वन वीक सीरिज पढ़ कर कोई भी बेचलर और मास्टर डिग्री अपने गले में लटका लेता है ।

हम शिक्षा व्यवस्था तोड़ने में मेकाले से भी चार कदम आगे निकले । मान लीजिये कि भारत की जनता शिक्षा व्यवस्था सुधारना चाहती है, तो क्या करे ?
कुतुबमीनार से छलांग लगाए ?

वोट करने के 5 साल पहले और 5 साल बाद तक उनके पास क्या विकल्प है । चूंकि सभी शासक चाहते है कि अवाम का विवेक कुंद रहे इसलिए अगर आप सोचते है कि शासक ऐसी शिक्षा व्यवस्था की रचना करेंगे जिससे अवाम में बुद्धि और विवेक पैदा हो तो यह हमारी भूल है ।
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क्या आप मुझे ऐसे व्यक्ति से भेंट करवा सकते है जो शिक्षा का मूल्य न समझता हो या वह अपनी सन्तानो को अशिक्षित रखना चाहता हो ? इतना विवेक और समझ सभी में है कि सभी को अच्छी शिक्षा मिलनी चाहिए। लेकिन यदि शिक्षा अधिकारी और शिक्षा मंत्री भारत की शिक्षा व्यवस्था को तोड़ने पर आमादा है तो आम नागरिक क्या कर सकता है ? आप जिले के अभिभावकों को अपने जिले के शिक्षा अधिकारी को नौकरी से निकालने का अधिकार दे दीजिये, अगले 5 वर्ष में शिक्षा में इतना सुधार आएगा जितना विगत 70 वर्षो में नहीं आ पाया है।
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कैसे राईट टू रिकॉल जिला शिक्षा अधिकारी का यह प्रस्तावित क़ानून देश की शिक्षा व्यवस्था में सुधार ले आएगा ?
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भारत में लगभग 700 जिला शिक्षा अधिकारी हैं । सभी बुद्धिमान, काबिल तथा कार्यकुशल है। और उनमें से, मान लीजिए, 10-15 ऐसे होंगे जो भ्रष्टाचार में रूचि नहीं रखते। इस राइट टू रिकॉल -जिला शिक्षा अधिकारी प्रक्रिया में एक खण्ड कहता है कि यदि कोई अधिकारी मुख्यमंत्री द्वारा जिला शिक्षा अधिकारी रखा जाता है तो वह केवल एक ही जिले का जिला शिक्षा अधिकारी हो सकता है। लेकिन यदि नागरिकों ने उसे जिला शिक्षा अधिकारी बनाया है तो वह राज्य में 5 जिलों और पूरे भारत में 10 जिलों का भी जिला शिक्षा अधिकारी बन सकता है और वह इन सभी जिलों का वेतन प्राप्त करेगा। अर्थात यदि कोई व्यक्ति 4 जिलों का जिला शिक्षा अधिकारी है और उसे नागरिकों ने नियुक्त किया है तो उसका वेतन 4 गुना होगा। यह ज्यादा सस्ता है क्योंकि वेतन ही चार गुना बढ़ेगा, चिकित्सा लाभ और कई आजीवन मिलने वाले लाभ 4 गुना नहीं बढ़ेंगे।

इसलिए वर्तमान 700 जिला शिक्षा अधिकारियों में से, मान लीजिए, 5-15 भ्रष्ट नहीं है । यदि एक बार रॉइट टू रिकॉल लागू हो जाता है तो उन्हें सीधी तरक्की और पदोन्नति का अवसर मिल जायेगा। वे अपने जिले के स्कूलों में अच्छे बदलाव लेकर आएँगे। वे बीच के अधिकारियों को घूस लेने से रोकेंगे । इस बात का ध्यान रखेंगे कि ठेकेदार सही वस्तुएँ जैसे ब्लैकबोर्ड , कुर्सियां आदि स्कूलों को देते हैं। वे ध्यान रखेंगे कि शिक्षक स्कूल में हाजिर रहें, आदि। अब मान लीजिए, इन सभी मामलों में मुख्यमंत्री इन अधिकारियों का तबादला कर देते है । तब लगभग 7-15 ऐसे मामलों में से, कम से कम 2-3 मामलों में तो माता-पिता अपने बच्चों की अच्छी शिक्षा के लिए जिला शिक्षा अधिकारी कानून का उपयोग करके उस तबादला किए गए अधिकारी को वापस ले आएंगे।
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इस तरह, भारत के 700 जिलों में से 2-5 जिलों में शिक्षा की स्थिति में सुधार आएगा। तो शेष जिलों का क्या होगा ? मान लीजिए आप ‘A’ जिले में रहते है, तथा ‘A’ जिले का जिला शिक्षा अधिकारी भ्रष्ट और नाकाबिल है। मान लीजिए, पास में ही पांच अन्य जिले B, C, D, D और E है। मान लीजिए, केवल E जिले में ही अच्छा जिला शिक्षा अधिकारी है। तो जिला A के नागरिकों के पास विकल्प होगा कि वे अपने जिले के जिला शिक्षा अधिकारी को हटा सकते है और E जिले के जिला शिक्षा अधिकारी को डबल पोस्ट/दोहरा कार्यभार दे सकते है । इसी विकल्प और अधिकार के कारण कि “अब नागरिक राईट टू रिकॉल – जिला शिक्षा अधिकारी का उपयोग करके मुझे हटा सकते हैं और मेरे पद पर E जिले के जिला शिक्षा अधिकारी को ला सकते हैं”, अन्य जिलो के जिला शिक्षा अधिकारीयों के मन में एक भय पैदा होगा। इसलिए या तो वे 2-3 महीनों में ही सुधर जाएंगे या तो नागरिक उन्हें राइट टू रिकॉल-जिला शिक्षा अधिकारी का प्रयोग करके हटा देंगे। इस तरह इस कानून के गैजेट में प्रकाशित होने के 8-10 महीनों में ही सभी 700 जिला शिक्षा अधिकारी या तो सुधर जाएंगे या बदल/निकाल दिए जाएंगे।
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10-20 महीनों के अंदर ही ,“जल्दी अमीर बनने” और “भाड़ में जाए जनता” की मानसिकता वाले अधिकारी प्रशासन से हटना शुरू होंगे और दुबारा इन प्रशासनिक पदों पर नहीं आ पाएंगे। इससे वास्तव में सेवा करने की इच्छा वाले लोगों को आने का ज्यादा मौका मिलेगा और भ्रष्टाचारी लोग ईमानदार लोगो के काम में कम बाधा डाल सकेंगे | वर्तमान सरकारी सिस्टम में एक कमी यह है कि यदि कोई ईमानदार व्यक्ति दो लोगों का काम करता है तो भी उसे दो व्यक्ति के बराबर वेतन नहीं मिलता, जबकि व्यापार में ऐसा होना आम बात है । ये बातें ईमानदार लोगों को सरकारी नौकरी में आने से हतोत्साहित करती हैं। पर इस प्रस्तावित राइट टू रिकॉल प्रक्रिया में, अधिकारीयों को एक से अधिक पद मिल सकता है तथा उसके अनुसार वे अधिक वेतन पा सकते है। इससे शासन में ईमानदार और समर्पित व्यक्तियों को आने का ज्यादा मौका मिलेगा।
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 2.“जिस प्रकार कोई भी राजनेता यदि कोई कड़ा निर्णय लेना चाहे जिस से जनता को वर्तमान में तात्कालिक परेशानी से गुजरना पड़े तो उस समय जनता को बरगलाना बहुत आसान होता है और राइट टू रिकॉल कानून के तहत किसी अच्छे निर्णय लेने वाले किसी भी मंत्री या अधिकारी को वापस बुलाया जा सकता है क्योंकि जनता अपनी अशिक्षा की वजह से किसी भी कठोर निर्णय के फायदे को समझ नहीं पाएगी और कोई भी अच्छा मंत्री या अधिकारी को अपना पद छोड़ना पड़ेगा दीर्घकालीन अवधि में यह कुल मिलाकर जनता के लिए नुकसानदायक ही होगा अतः सबसे पहले जनता को समग्र रूप से शिक्षित करने का अभियान चलाना अति आवश्यक है अन्यथा यह कानून निरर्थक है
उत्तर :-
यदि नीति नियंता कोई ऐसा फैसला लेता है जिससे प्राथमिक चरण में नागरिको को परेशानी का सामना करना पड़ेगा किन्तु दीर्घकाल में देश/जनता को फायदा होगा तो शासन का यह दायित्व है कि वे सघन प्रचार अभियान चलाकर अमुक फैसले के फायदों के बारे में नागरिको को सूचना दें तथा उनका समर्थन करे। सरकार के पास असीमित संसाधन होते है, अतः सरकार के एवज में कोई अन्य पार्टी/पक्ष आदि भ्रामक सूचनाएं देकर जनता को बरगला नहीं सकता। यदि तब भी देश के करोडो नागरिको का बहुमत किसी फैसले का विरोध करता है तो सरकार को अमुक फैसले को स्थगित करना चाहिए या इस्तीफा दे देना चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र बहुमत के आधार पर चलता है। लोकतंत्र में सही या गलत नहीं होता। बहुमत व अल्पमत होता है।
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फैसला स्थगित करके सरकार नागरिको को फैसले के गुणों के बारे में सूचित कर सकती है तथा समर्थन जुटा कर फिर से लागू कर सकती है।
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“नागरिको समग्र रूप से शिक्षित करने का अभियान” चलाने का सर्वश्रेष्ठ विकल्प राईट टू रिकॉल जिला शिक्षा अधिकारी के क़ानून को गेजेट में प्रकाशित करना है।
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 3.जिस तरह से अगर अल्पमत की जुगाड़ू सरकार बन जाए तो उसमें जिस प्रकार खरीद फरोख्त चलती है उसी प्रकार राइट टू रिकॉल कानून के तहत भी बार-बार सरकार चेंज होगी इसका खामियाजा आर्थिक रूप से अभी देश उठाने के रूप लिए सशक्त नहीं है”।
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उत्तर :-
१. राईट टू रिकॉल कानूनों के आने से पार्टी सिस्टम टूट जाएगा। 
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. अव्वल तो करोडो नागरिको को खरीदा नहीं जा सकता है, और दुसरे यदि एक बार खरीद भी लिया जाता है तो चूंकि हमारे द्वारा प्रस्तावित प्रक्रिया में नागरिक किसी भी दिन अपना वोट बदल सकते है अतः उम्मीदवार को रोज पैसे चुकाने होंगे। अतः खरीद फरोख्त करना संभव नहीं है।
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३. पूरी सरकार को रिकॉल नहीं किया जा सकता। अतः रिकॉल से सरकार चेंज नहीं होगी। उदाहरण के लिए यदि पेट्रोल मंत्री भ्रष्टाचार कर रहा है तो सिर्फ पदस्थ पेट्रोल मंत्री को हटाकर नागरिक अन्य किसी व्यक्ति को पेट्रोल मंत्री बना देंगे, तथा शेष सरकार निर्विघ्न कार्य करती रहेगी।
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४. हमने वोटिंग पर शुल्क रखा है। पटवारी की कचहरी में जाकर वोट देने पर 3 रूपये चुकाने होंगे तथा sms द्वारा वोट करने पर 10 पैसे से 50 पैसे का शुल्क लगेगा। अतः चुनाव आयोग पर आर्थक बोझ नहीं आएगा।
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 4. इसको एक दूसरे उदाहरण के रूप में इस प्रकार समझा जा सकता है जिस प्रकार पाकिस्तान के पास परमाणु शक्ति है और इससे कई अन्य देश भी डरे हुए हैं कि कहीं पाकिस्तान अपनी परमाणु शक्ति का दुरुपयोग नहीं कर ले क्योंकि परमाणु अधिकार संपन्न होना उसका अपना अधिकार है लेकिन पाकिस्तान के नियत और इरादे और इतिहास अच्छा नहीं है इसीलिए सभी लोग संकित रहते हैं कि यह कब उनका दुरुपयोग करके मानव जाति के विनाश का कारण बन जाए अतः राइट टू रिकॉल कानून भी एक अच्छा कानून हो सकता है लेकिन इसे काम में लेने वाला व्यक्ति यदि शिक्षित नहीं है तो वह उसका दुरूपयोग कर सकता है”।
उत्तर :- 
परमाणु बम का बटन दबाने की शक्ति दर्जन भर लोगो ( प्रधानमंत्री एवं कैबिनेट ) के पास होती है जबकि रिकॉल करने के लिए करोडो नागरिको को वोटिंग मशीन पर बटन दबाने होंगे। अतः स्थिति बिलकुल भिन्न है।
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और यदि किसी व्यक्ति को लगता है कि — “राइट टू रिकॉल कानून भी एक अच्छा कानून हो सकता है लेकिन इसे काम में लेने वाला व्यक्ति यदि शिक्षित नहीं है तो वह उसका दुरूपयोग कर सकता है”— तो ऐसे व्यक्तियों से यह पूछा जाना चाहिए कि चूंकि भारत के लोग अशिक्षित है तो वे नागरिको के वोटिंग राईट ( राईट टू वोट ) को निलंबित कर देने की मांग क्यों नहीं कर रहे है ?

 🚩राईट टू रिकॉल, ज्यूरी प्रणाली, वेल्थ टैक्स जैसेे क़ानून आने चाहिए जिसके लिए, जनता को ही अपना अधिकार उन भ्रष्ट लोगों से छीनना होगा, और उन पर यह दबाव बनाना होगा कि इनके ड्राफ्ट को गजेट में प्रकाशित कर तत्काल प्रभाव से क़ानून का रूप दें, अन्यथा आप उन्हें वोट नहीं देंगे.
अन्य कानूनी ड्राफ्ट की जानकारी के लिए देखें fb.com/notes/1479571808802470

https://wordpress.com/post/righttorecallc.wordpress.com/1882 

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 जय हिन्द, जय भारत, वन्देमातरम ||

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